Poetic Title: “खामोशी का योद्धा — Guru Tegh Bahadur Ji को समर्पित” (The Warrior of Silence)

 

Poetic Title:

“खामोशी का योद्धा — Guru Tegh Bahadur Ji को समर्पित”

(The Warrior of Silence)


Poetic Content

आज का दिन
इक कहानी नहीं,
इक धड़कन है…
जो सदियों से
चाँदनी चौक की हवा में
धीरे–धीरे साँस लेती है।

वो दिन—
जब एक संत
मौत के सामने खड़ा था,
पर मौत काँप रही थी
उसकी मुस्कान से।

जब हथियारों की नहीं,
आवाज़ों की लड़ाई थी…
और उसने अपने शब्दों से नहीं,
खामोशी से इतिहास बदला।

कहते हैं—
राजाओं की तलवारें तेज थीं,
पर एक संत की नज़र में
सच की चमक ज़्यादा थी।
वो निडर था…
क्योंकि उसका साहस
किसी राजसभा से नहीं,
किसी बादशाह से नहीं,
सीधे ईश्वर से आता था।

वो जानता था—
सिर कट सकता है,
पर सत्य नहीं।
शरीर गिर सकता है,
पर धर्म की इज़्ज़त नहीं।
मौत छू सकती है,
पर मन को नहीं।

उसके एक कदम से
कई सभ्यताएँ बचीं,
उसकी एक साँस से
कई पंथ ज़िंदा रहे,
उसके एक बलिदान से
आज तक इंसानियत चलती है।

और आज…
जब दुनिया शोर से भरी है,
जब सच भी भीड़ में खो जाता है,
जब इंसान विचारों से नहीं,
डर से जीता है…
उसका बलिदान
और भी ऊँचा लगता है।

कभी–कभी लगता है
वो हमारे आज के लिए ही शहीद हुआ था—
ताकि हम समझ सकें
कि धर्म किताबों से नहीं,
दिलों से चलता है।
कि साहस तलवारों में नहीं,
शांति में छिपा होता है।
और कि खामोशी…
कभी–कभी सबसे बड़ी लड़ाई जीत लेती है।

नमन उस संत को—
जो सिर झुकाने नहीं,
ऊँचा उठाने आया था।
जो भारत की ढाल बनकर आया,
और अमर होकर लौट गया।

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